कहीं कुछ बिखरा हुआ है PARTITION OF INDIA POEM
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कहीं कुछ बिखरा हुआ है
क्या पता नहीं
तेरे लिए बहुत जरूरी है क्या
नहीं पता नहीं
क्यों लगता है तुझे ऐसा कि कुछ बिखरा हुआ है
किसी वक्त की कुछ यादें हैं
जिनके टूटे टुकड़े ना जाने
क्यों बिखरे दिखते हैं मुझे
कैसी हैं वो यादें
क्या उनकी कोई शक्ल है
या क्या है ?
सन 47 में देश जब टूटा
कुछ यादें इस ओर ,कुछ उस ओर
यूं हो गया मानो यादों का
एक गुलदस्ता था जो जमीन पर गिर गया
गिर कर चूर चूर हो गया
घड़ी में वक्त बताने वाली वो सूइयां
जो 1,2,3,4 ऐसे कर 12 बिंदुओं पर रुकती थी
वो घड़ी टूट गई
सुईया बाहर निकल कर कहीं गिर गई
हो सकता है टूट गई हो
मैंने बहुत ढूंढा पर मिली नहीं
शायद उन मजबूर लोगों के जैसे
जिन्होंने उस वक्त कुछ ना कुछ खोया
किसी ने अपना बेटा खोया
किसी ने बेटी
किसी ने मां
किसी ने बाप
क्या पता कोई और लकीरों को पार करता करता अनाथ हो गया हो
और फिर स्लेट पर मां बाप का नाम लिखकर
कई अरसे तक उनके इंतजार में
उस स्लेट को पकड़कर खड़ा रहा हो
सूइयों के साथ वो बिंदु भी टूट गए
अब यह घड़ी तो सही ना होगी
सब बिखर गया है टूट गया है
पर लगता है
अभी कहीं ना कहीं कुछ यादें
अब भी बिखरी पड़ी होंगी
क्या हो सकता है कुछ यादों को मिलाया जा सके
पता नहीं, हां भी नहीं भी
मैं क्या जानू इसी उधेड़बुन में दिन में लगा हुआ
WRITTEN BY ROHIT CHAKRVERTY
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