RANDOM THOUGHTS

( 01 ) सुन, कलकल, छलछल,
मधुघट से गिरती प्यालों में हाला,
सुन, रूनझुन रूनझुन चल
वितरण करती मधु साकीबाला,
बस आ पहुंचे, दूर नहीं कुछ,
चार कदम अब चलना है,
चहक रहे, सुन, पीनेवाले,
महक रही ले , मधुशाला
( 02 ) तेरी आरज़ू मुझे सोने नहीं देती ,
मेरी नींद जैसे किसी रस्ते में रूक गयी हो
मेरी रात लम्बी है तो क्या
( 03 )
लोग हर मोड़ पे रुक रुक के सँभलते क्यूँ हैं
इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यूँ हैं
(04 )
न हम-सफ़र न किसी हम-नशीं से निकलेगा
हमारे पाँव का काँटा हमीं से निकलेगा
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है
लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है
ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले
ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है
सितारों से आगे जहाँ और भी हैं
अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं
तही ज़िंदगी से नहीं ये फ़ज़ाएँ
यहाँ सैकड़ों कारवाँ और भी हैं
क़नाअत न कर आलम-ए-रंग-ओ-बू पर
चमन और भी आशियाँ और भी हैं
अगर खो गया इक नशेमन तो क्या ग़म
मक़ामात-ए-आह-ओ-फ़ुग़ाँ और भी हैं
तू शाहीं है परवाज़ है काम तेरा
तिरे सामने आसमाँ और भी हैं
इसी रोज़ ओ शब में उलझ कर न रह जा
कि तेरे ज़मान ओ मकाँ और भी हैं
गए दिन कि तन्हा था मैं अंजुमन में
यहाँ अब मिरे राज़-दाँ और भी हैं
इन अंधेरों से परे इस शब-ए-ग़म से आगे
इक नई सुब्ह भी है शाम-ए-अलम से आगे
दश्त में किस से करें आबला-पाई का गिला
रहनुमा कोई नहीं नक़्श-ए-क़दम से आगे
साज़ में खोए रहे सोज़ न समझा कोई
दर्द की टीस थी पाज़ेब की छम से आगे
ऐ ख़ोशा अज़्म-ए-जवाँ ज़ौक़-ए-सफ़र जोश-ए-तलब
हादसे बढ़ न सके अपने क़दम से आगे
याद है लज़्ज़त-ए-आज़ार-ए-मोहब्बत अब तक
दिल को मिलता था सुकूँ मश्क़-ए-सितम से आगे
सुर्ख़-रू है जहाँ तारीख़-ए-दो-आलम 'इशरत'
ख़ून टपका है वहीं नोक-ए-क़लम से आगे
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