मुझे समझ नहीं आता कि मैं क्यों हिन्दू हूं तू क्यों मुस्लिम है
मुझे समझ नहीं आता कि मैं क्यों हिन्दू हूं तू क्यों मुस्लिम है
मुझे समझ नहीं आता
कि मैं क्यों हिन्दू हूं
तू क्यों मुस्लिम है
मैं मुस्लिम , तो तू क्यों हिन्दू है
हमारी परवरिश तो एक जैसी है
मेरा ख्याल है , लाज़मी भी है
बचपन में हम दोनों की किलकारियां
भी एक जैसी रही होंगी
भूख की वजह से
मम्मी या अम्मी की गोद में
जाने के लिए रोते तो हम दोनों
एक जैसा ही होंगे
बस फर्क इतना ही है
कि मैं भगवान की याद में
अपने हाथों को जोड़ता हूं
तू अपने दोनों हाथों को उठा कर
परवरदिगार को याद करता है
तो क्या बस यही फर्क है
हां ज़ुबां में कुछ फर्क है
पर मतलब तो एक जैसा है
मैं मम्मी कहूं , या तू अम्मी कहे
प्यार तो दोनों का एक जैसा है
मैं पिताजी कहूं , तू अब्बा हुज़ूर कहे
पर छत की छांव तो एक जैसी है
तुझे ईद में ईदी मिले
मुझे दीवाली पे पटाखे मिले
तुझे ईद में अचकन मिली
मुझे दीवाली में कुर्ता पजामा मिली
क्या जब दुनिया बनी
तो दुनिया बनाने वाले ने
कभी कोई फ़र्क किया था
क्या ???
तुझमें , मुझमें
देखने से तो लगता नहीं
मेरे और तेरे हाथ
दोनों एक जैसे हैं
उंगलियों की गिनती भी एक जैसी है
खून का रंग भी एक जैसा है
मैं मुस्लिम हूं , तू हिन्दू है
क्यों .......
तो मैं फर्क देखूं कहां
मुझे तो समझ नहीं आता
ये बला क्या है ?
फर्क करना ......
written by ROHIT CHAKRVERTY
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