मंटो और विभाजन






वो हड्डियां कहाँ जलाई जाएंगी या दफ़नाई जाएंगी ,
जिन पर मज़हब का गोश्त चीलें नोच नोच के खा गए  
                                   -   सआदत हसन मंटो

जब लाशों को दफन किया गया या जलाया गया होगा,
तो क्या लाश पर कोई निशानी बची होगी ,
जो चीख चीख कर या चिल्ला कर 
अपने धर्म का पता दे रही होगी 
जो ये बताये की लाश के साथ क्या किया जाए ,
जलाया जाए या दफनाया जाया 

क्या बढ़ी हुयी दाढ़ी इसका सबूत दे पायी होगी,
क्या जनेऊ इसका जवाब दे पाया होगा,
क्या और निशानी भी रही होगी ,
न मालूम , क्या पता

तो क्या हुआ होगा लाशों का ,
कहीं किसी हिन्दु की लाश को ,
मुस्लिम समझ कर कहीं दफना तो नहीं दी होगी,
या किसी मुसलमान की लाश को ,
हिन्दु समझ कर जला तो नहीं दिया होगा 
                                                                               - रोहित चक्रवर्ती 

जब मैने उस खून के समंदर में गोते लगाए,
जो इंसान ने इंसान की रूहों से बहाया ,
तो मुझे चंद मोती मिले ,
आंसुओं के , अफ़सोस के , शर्म के 
                           -  सआदत हसन मंटो


आंसुओं को क्या कहें , 
क्या पता वो आंसू किसके हों 
माँ के या अम्मी जान के 
पिता जी के या अब्बा हुज़ूर के 
बच्चों के या चाहने वाली मासूका के 

अफ़सोस भी न जाने किस किस चीज़ के लिए होंगे 
कई बातें थी , कई लफ्ज़ थे 
जो बयाँ न हो पाए 
कई सपने थे जो पूरे न हो पाए 

शर्म क्या हैवानियत के बाद भी बची होगी इंसान में 
मालुम होता है की दिल के किसी कोने में 
इंसानियत कुछ वख्त के लिए ज़िंदा रही हो 
रोहित चक्रवर्ती 

आखिर में 

जहां मेरा बचपन बीता , जहां मेरे अम्मी और अब्बा दफन हैं 
अब वो मेरा वतन नहीं , मेरा वतन अब पाकिस्तान है 
मेरे मुल्क की तरह मैं भी कटकर आज़ाद हुआ 
और आप समझ सकते हैं 
एक परकटे परिंदे की आज़ादी कैसी होती है 
                                                                 - सआदत हसन मंटो 



एक कोशिश की इस छोर को छूने की , घाव कई हैं ,पर वख्त मरहम बना 

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