1947 देश का विभाजन -विभाजन दिलों का या धर्मों का [ 1947 PARTITION OF INDIA - PARTITION OF HEARTS OR RELIGION ?



1947 जब शहरों का जलना शुरू हुआ 

जब जलने हुए शुरू घर
तो किसी ने कहा हिन्दू का घर जला
तो किसी ने कहा मुसलमां का घर जला

मुझे तो लगा यूँ कि
न हिन्दू का घर जला ,
न मुसलमां का घर जला

उस आग ने न हिन्दू का घर छोड़ा , न मुसलमान का
क्यूंकि उस आग का कोई मज़हब न था

जला तो सारा शहर जला
वो शहर जला जिस शहर का न कोई धर्म था
न कोई जाति थी

शहर जलने के बाद वजूद तो सिर्फ राख का था,
वो किसी हिन्दू या मुसलमान के घर की राख़ न थी
वो तो किसी हंसते खेलते परिवार के घर की राख़ थी

उस राख़ का कोई मज़हब नहीं था
सिर्फ रंग था वो भी काला

उस काली राख को भी हवा उड़ा ले गयी
मानो वजूद तो किसी इंसान की परछाईं का था
वो परछाईं भी उस काली रात में कहीं घुम हो गयी
मानो इंसान और उसकी परछाईं
दोनों का वजूद खत्म हो गया


ये कविता शायद उस दुखद घटना को कुछ हद तक बयाँ करती हो 

ये कविता पूर्ण रूप से मेरे द्वारा लिखित है 




                                              आशा करता हूँ मेरी ये कृति आपको अच्छी लगे , सुझाव या संदेश COMMENT BOX में ज़रूर लिखें 

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