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Showing posts from August, 2019

मैं अपने मन की चाहूँ तो कर लूँ

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मैं अपने मन की चाहूँ तो कर लूँ मैं अपने मन की चाहूँ तो कर लूँ  पर पता है किसी मोड़ पे तुझसे  फिर मुलाकत हो जाएगी मेरी तब मैं शायद किताबों को  अपने हाथ में थामे बस्ते को कंधे पर लटकाये  हुए तुझसे मिलूंगा पर तू शायद कुछ ज़िंदगियों को ज़िंदा रखने के लिए  उनकी भूख की आग को  शांत करने के लिए  अपने कंधे पर  हो सकता है  नंन्हे नन्हे भी हों  कंधे तेरे  उन पर वो बोरा जिसमे कूड़ा जो तूने इकठ्ठा किया हो  भरा हो  औरों के लिए या मेरे लिए  महज़ वो कूड़ा है  पर तेरे लिए ,  तेरे घर के चूल्हे की आग जलाने के लिए  भूख की आग मिटने के लिए  सामान का बंदोबस्त करने को है  ये कूड़ा  मेरी किताबों में तो चंद अक्षर होंगे तेरे कंधे पर तो कई ज़िंदगानियाँ हैं पर वायदा है मेरा  अगर उस मोड़ पर मैं  अपने हाथों में  तेरी खुशहाली  अगर किताबों में हो तो किताबें  नहीं तो तेरे लिए भानुमति का पिटारा ले खड़ा होऊंगा  बस यही तमन्ना है मेरी ...

मुझे समझ नहीं आता कि मैं क्यों हिन्दू हूं तू क्यों मुस्लिम है

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मुझे समझ नहीं आता  कि मैं क्यों हिन्दू हूं  तू क्यों मुस्लिम है मुझे समझ नहीं आता कि मैं क्यों हिन्दू हूं तू क्यों मुस्लिम है मैं मुस्लिम , तो तू क्यों हिन्दू है हमारी परवरिश तो एक जैसी है मेरा ख्याल है , लाज़मी भी है बचपन में हम दोनों की किलकारियां  भी एक जैसी रही होंगी भूख की वजह से  मम्मी या अम्मी की गोद में  जाने के लिए रोते तो हम दोनों एक जैसा ही होंगे बस फर्क इतना ही है कि मैं भगवान की याद में  अपने हाथों को जोड़ता हूं तू अपने दोनों हाथों को उठा कर परवरदिगार को याद करता है तो क्या बस यही फर्क है हां ज़ुबां में कुछ फर्क है पर मतलब तो एक जैसा है मैं मम्मी कहूं , या तू अम्मी कहे प्यार तो दोनों का एक जैसा है मैं पिताजी कहूं , तू अब्बा हुज़ूर कहे पर छत की छांव तो एक जैसी है तुझे ईद में ईदी मिले मुझे दीवाली पे पटाखे मिले तुझे ईद में अचकन मिली मुझे दीवाली में कुर्ता पजामा मिली क्या जब दुनिया बनी तो दुनिया बनाने वाले ने कभी कोई फ़र्क किया था क्या ??? तुझमें , मुझमे...