मैं अपने मन की चाहूँ तो कर लूँ
मैं अपने मन की चाहूँ तो कर लूँ मैं अपने मन की चाहूँ तो कर लूँ पर पता है किसी मोड़ पे तुझसे फिर मुलाकत हो जाएगी मेरी तब मैं शायद किताबों को अपने हाथ में थामे बस्ते को कंधे पर लटकाये हुए तुझसे मिलूंगा पर तू शायद कुछ ज़िंदगियों को ज़िंदा रखने के लिए उनकी भूख की आग को शांत करने के लिए अपने कंधे पर हो सकता है नंन्हे नन्हे भी हों कंधे तेरे उन पर वो बोरा जिसमे कूड़ा जो तूने इकठ्ठा किया हो भरा हो औरों के लिए या मेरे लिए महज़ वो कूड़ा है पर तेरे लिए , तेरे घर के चूल्हे की आग जलाने के लिए भूख की आग मिटने के लिए सामान का बंदोबस्त करने को है ये कूड़ा मेरी किताबों में तो चंद अक्षर होंगे तेरे कंधे पर तो कई ज़िंदगानियाँ हैं पर वायदा है मेरा अगर उस मोड़ पर मैं अपने हाथों में तेरी खुशहाली अगर किताबों में हो तो किताबें नहीं तो तेरे लिए भानुमति का पिटारा ले खड़ा होऊंगा बस यही तमन्ना है मेरी ...